शहर का दरख़्त
उजड़ा हुआ सा आप वीरान जंगल हूँ मैं,
मेरी राहों में ग़मों के फूल सजे हुए हैं।
मेरे तसब्बुर की तितलियाँ रंगहीन हैं,
और मेरे आकाश धूल से भरे हुए हैं।
मुझ पर बसते थे चिड़ियों के कई झुंड,
मैं पत्थर खा कर भी मीठे फल देता था,
मुझे सावन से ज्यादा जेठ सुहाता था।
मैं ग़मों से कराहता था तो हँस देता था,
वो चिड़ियाँ और वो लोग मेरी हस्ती थे,
मेरी खुशी फल से लदे-झुके डालों में थी,
मेरी चाहत में सिर्फ कुछ काले बादल थे,
मेरी खुशी बच्चों को खुशी पहुँचाने में थी।
ख़ैर वक़्त गुज़रा, सफर मेरा भी ख़त्म हुआ,
या यूँ कहो, मौत ने की ज़िंदगी से जालसाजी।
गाँव होता तो कोई तो आता याद में रोने मेरी,
शायद रवायत ही यही है शहर की "झाजी"।