पेड़ और पत्ता
पेड़ और उस पत्ता का सम्बन्ध
वैसा ही है,
जैसे नदी - किनारे का,
दोनों साथ चलते हैं,
बहुत दूर तक,
हालाँकि नदी की अपनी मजबूरी भी होती है,
कभी किनारे के दूर तो
कभी किनारे के सहारे ही चलती है,
पर शायद अंत में
नदी समुद में समा जाती है
और किनारा खत्म हो जाता है
फिर उन्हें क्या ख़बर
कि कौन कहाँ और कैसा है!
ख़ैर, पेड़ और पत्ता,
दोनों के अपने सुख-दुख
और जिम्मेदारियाँ भी हैं,
पेड़ को जड़ से मिट्टी को पकड़े रहना है,
छोड़ना नहीं है,
पेड़ कहता है कि मिट्टी के पेड़ पर
बहुतेरे एहसान हैं,
फिर पेड़ की डालियाँ, तने
और ढेर सारे पत्ते भी हैं,
कभी कोई आँधी आती है तो
डालियों को झकझोर जाती है,
कुछ कीट-कीड़े आते हैं
और तने को ही खोद देते हैं,
यूँ ही और भी परेशानियाँ हैं पेड़ की।
पत्ता भी बहुत सहता है, तेज़ हवाएँ,
कड़ी धूप उसे भी सताती हैं।
कहते हैं, दुखों को बाँट लो
तो कम हो जाते हैं और
सुखों को बाँट लो
तो बढ़ जाते हैं।
सो वह पेड़ और पत्ता,
इक दूसरे के सुख-दुख के साझेदार हैं,
इक दूसरे की सुनते हैं,
इक दूसरे से बोलते हैं,
ढेरों किस्से बतियाते हैं।
हाँ, हवाओं को ये मालूम न था कि
पेड़ और पत्ता साथ रहकर खुश होते हैं,
और हों भी क्यूँ ना,
ऐसे रिश्ते बनते-बनते, बनते हैं
मग़र पत्ता ये महसूस करता था,
कि इक दिन उसे पेड़ से गिर जाना होगा।
हालाँकि पेड़ की समझदारी काबिलेतारीफ थी,
उसे भविष्य की चिंता करके दुख करने के बजाय,
वर्तमान में भरोसा था।
और इसी तरह पेड़ और पत्ता,
हँसी - खुशी व ग़म और आँसू
लिए साथ रहते थे।
फिर वह मनहूस दिन आया,
जब वो दोनों हिचक-हिचक कर रो रहे थे,
यूँ लग रहा था मानो आज इनकी जान चली जाएगी।
पत्ता गिरते-रोते हुए गा रहा था,
ओ पेड़, ओ पेड़ तुम्हारे तो कई पत्ते हैं,
तुम तो जी लोगे,
मेरा क्या, मेरे तो सिर्फ तुम थे,
सिर्फ तुम.....
ना जाने पत्ता धूप की तपन से
पीला होके गिरा था या
हवाओं के ज़ोर से,
गिरा ज़मीन पे,
शायद दफ्न हो गया,
कब्र से बरामद हुई चिट्ठी में
लिखा है उसने पेड़ को,
अगले जन्म में फिर तुम्हारे ऊपर
ही लगने की आशा में,
--- मैं