नदी के दो किनारे
नदी के बारे में जब भी सोचता हूँ,
मुझे हमारी अपनी ही कहानी लगती है।
हिमनद का पिघलना,
झरना बनके चट्टानों पे गिरना,
पत्थरों और पहाड़ों को काटते हुए आगे बढ़ना,
और फिर नदी बनना, बहना...
श्रमसाध्य को ही एकमात्र रास्ता मानते हुए भी,
मैं चकित और निःशब्द होता हूँ, ये सोचकर
कि हर धारा नदी नहीं बन पाती है।
या तो सब कुछ अनियत है या फिर सब कुछ नियत,
चलो इसको संयोग कह देते हैं अभी के लिए।
एक किनारा तुम और दूसरा मैं,
बहता पानी, हमारा जीवन,
उसका आवेग, हमारी ऊर्जा,
उसकी चंचलता, हमारी हँसी,
उसका उफनना, हमारा पागलपन,
सूखना उसका, दुःख हमारे...
नदी के दोनों किनारे साथ चलते हुए भी, एक नहीं होते हैं,
वे दो होते हैं, लेकिन एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं!
प्रायः यही दूरी उन्हें एक जोड़ा बना के रखता है।
इस दूरी के दरम्यान ही खिलते हैं हमारे इच्छाओं के रंग,
जैसे हवाओं का बहना, हो हमारे सांसों का टकराना,
शायद इस दूरी में ही पनपती है, साथ चलने की लालसा।
किनारों के बीच में मापी जा सकने वाली दूरी का न होना,
नदी का अंत होगा शायद!
समुद्र में विलीन होने तक,
तुम्हारा अपना किनारा!